अशोक मल्ल: वो एक्टर जो पहले किसान फिर सबकुछ था

1987 में जब पहली कुमाऊँनी फ़िल्म मेघा आ रिलीज़ हुई तो एक डायलॉग सबकी जुबां पर था। ‘गंगुवा की खुकुरी दुधारी भै, दुधारी’। जिन्होंने इस डायलॉग को फ़िल्म के विलन के मुँह से सुना, उन्हें आज भी ये डायलॉग याद है। इसे अमर करने वाले थे- अभिनेता अशोक मल्ल।

अशोक मल्ल एक अभिनेता से पहले किसान थे और वो ख़ुद ये ज़ाहिर किया करते थे। वो अपनी जड़ों की खोज में भी जुटे थे लेकिन उससे पहले  वो  हो गया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।

अशोक मल्ल का निधन
8 जुलाई, 2020। सुबह के 5 बजकर 57 मिनट हो रहे थे। नवी मुंबई के साई स्नेहदीप हॉस्पिटल में उत्तराखंड का एक और चमकता सितारा बुझ गया। उत्तराखंड की दर्जनों फ़िल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरने वाले अशोक मल्ल हमेशा के लिए चले गए।अशोक लंबे समय से बीमार थे। वह कैंसर की बीमारी सी पीड़ित थे।

पहले किसान फिर एक्टर थे अशोक
अशोक मल्ल ने मेघा आ, चक्रचाल, मेरी गंगा होली त् मैमु आली, कौथिग, बंटवारु समेत कई फ़िल्मों में अभिनय किया। अशोक जी ने गोपी भिना फ़िल्म का निर्देशन भी किया था। एक अभिनेता होने से पहले अशोक प्रकृति प्रेमी थे। मुंबई के कोलाबा में उनका अपना बोटैनिकल गार्डन है। सिर्फ़ यही नहीं अशोक को ख़ुद को किसान कहने में फक्र महसूस होता था। यही वजह है कि सोशल मीडिया में अपने परिचय में सबसे पहले वह किसान लिखते थे और फिर बाक़ी चीजें। 

अपनी जड़ों की खोज में जुटे थे अशोक दा
अशोक दा वैसे तो पिथौरागढ़ के मूल निवासी थे। वह धपड़पट्टा, पुलिस लाइन के रहने वाले थे। पिथौरागढ़ के मिशन इंटर कॉलेज से 1978 में उन्होंने ग्रैजुएशन पूरा किया। लंबे समय से वह अपने परिवार के साथ मुंबई में ही रहते थे।

वो अपनी जड़ों की खोज में जुटे थे। पिछले साल से वो अपने वंशजों के मूल ठिकाने का पता लगाने में जुटे हुए थे। अपनी इस खोज में उन्हें पता चला कि वे नेपाल से उत्तराखंड आए थे। उनकी बड़बूबू ब्रिटिश आर्मी में थे। उनके बुबु का जन्म अल्मोड़ा के वार कैंप में हुआ था। उसके बाद उनकी परवरिश देवलथल के मल जमतड़ निवासी उनके रिश्तेदारों ने की थी। अशोक जमतड़ जाने की तैयारी में थे लेकिन तभी बीमारी ने उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया और वो अपनी जड़ तक पहुँचने से पहले ही चले गए। 

रहते मुंबई में थे, दिल उत्तराखंड में था
अशोक दा वैसे तो मुंबई में रहते थे लेकिन उनका दिल हमेशा उत्तराखंड में बसता था। गोपी बिना के प्रीमियर पर सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने उत्तराखंड को याद किया था। इस दौरान उन्होंने लोगों से अपनी बोली-भाषा याद रखने को कहा। उन्होंने कहा कि आप दुनिया के जिस भी कोने में रहें। जहां भी रहें। जो भी करें। आप चाहें दुनिया की कोई भी भाषा सीख लें लेकिन अपनी मातृ भाषा कभी न भूलें। क्योंकि वही हमारा मूल है।

उत्तराखंडी फ़िल्मों का इतिहास ज़्यादा पुराना नहीं है। लेकिन जितना भी है, उसमें अशोक मल्ल जी की बहुत ही अहम भूमिका है। आज उत्तराखंडी फ़िल्मों की कल्पना उनके अभिनय के बिना करना संभव नहीं।

उम्मीद करते हैं कि भविष्य में हमारा सिनेमा भी भोजपुरी और दूसरे क्षेत्रीय सिनेमा की तरह आगे बढ़ेगा। अशोक मल्ल जैसे अभिनेताओं का योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

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